विकसित कार्यशाला मैं गर्भस्थ शिशु में संस्कार डालने की कला की दी गई जानकारी

योगासन से गर्भवती महिलाओं को प्रसव वेदना बर्दाश्त करने की क्षमता होगी  

कानपुरविशेषज्ञ अद्भुत मातृत्व की रिसर्च में जुट गये हैं। उन्होने इस बात की पुुष्टि की है कि दम्पत्ति अपने बच्चे को दुनिया में आने से पहले जैसा चाहें वैसा बना सकते हैं। बेहतर होगा कि इसके लिये माॅ धार्मिक वातावरण में रहें।  गायनोकोलाजिस्ट डा.संगीता सारस्वत ने सुरक्षित मातृत्व एवं गर्भ संस्कार विषय पर आयोजित कार्यशाला मैं बुधवार को बताया कि चौथे माह से गर्भस्थ शिशु की मस्तिष्क की कोशिका तेजी से विकसित होती हैं। विकास की यह प्रक्रिया हर मिनट की दर से होती हैं और इस अवधि में बच्चे के अवचेतन मस्तिष्क मैं सूचना एकत्र होती रहती हैं और जब शिशु जन्म लेकर दुनिया में आता है तो ये सूचना गुण-अवगुण का रूप लेकर उसके व्यक्तित्व में जुड़ जाती है। उन्होंने बताया कि,धार्मिक क्रियाकलापों के अलावा अगर गर्भवती महिलाऐं योगासन भी करें तो इससे उन्हें प्रसव वेदना बर्दाश्त करने की क्षमता विकसित होगी। इस प्रक्रिया की सबसे अद्भुत बात ये है कि योगाभ्यास करने वाली माताऐं अपने पेट पर हाथा रखकर गर्भस्थ शिशु से बात कर सकती हैं और पाॅच हजार शब्द तक सिखा सकती हैं। यानि बच्चा दुनिया मे आने से पहले ज्ञान का भण्डार ग्रहण कर चुका होगा।ये जरूरी नहीं है कि सभी गर्भवती महिलाऐं धार्मिक प्रवृत्ति वाली ही हों। यदि कोई दम्पत्ति ईश्वर में आस्था नहीं रखता है यानि वो नास्तिक हैं तो भी वे अपने बच्चे को सुसंस्कृत बना सकते हैं। इसके लिये बस उन्हें मधुर संगीत सुनना होगा और अच्छे कुदरती वातावरण में अधिक से अधिक समय गुजारना होगा। कार्यशाला के पहले दिन तमाम गर्भवती महिलाऐं गर्भस्थ शिशु में संस्कार डालने की कला सीखने पहुॅचीं।इस अवसर पर सीएसजेएमयू की कुलपति प्रो.नीलिमा गुप्ता,जीएसवीएम प्राचार्य डा.आरती लाल चंदानी,डा.किरण पांडेय,डा.संगीता सारस्वत आदि डाक्टर मौजूद रहे।

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