सीआइटी प्रभारी समेत आठ पुलिसकर्मियों पर एफ आईआर

कोरबा 8 जून(आरएनएस)। पुलिस की पिटाई से हिरासत में आदिवासी युवक शब्बीर जोगी की हुई मौत के मामले में न्यायिक जांच की रिपोर्ट के आधार पर तात्कालीन सीआइटी के प्रभारी समेत सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ  स्वदोष मानव वध का मामला धारा 304 के तहत पंजीबद्ध किया गया है। चोरी का आरोप कबूलवाने कई दिन तक अवैध ढंग से हिरासत में रखकर सीआइटी की टीम ने शब्बीर को बेदम पीटा। इस दौरान उसकी सीआइटी कार्यालय में ही मौत हो गई। आनन-फ ानन में शव को पुलिसकर्मियों ने अस्पताल भिजवा दिया था।
हरदीबाजार के ग्राम भलपहरी में रहने वाला शब्बीर जोगी 37 बबलू देवार, 36 गंगू देवार व चंदन देवार को तात्कालीन पुलिस की जांच टीम सीआइटी के प्रभारी कृष्णा कुमार ध्रुव ने चोरी के एक मामले में मानिकपुर चौकी के नजदीक संचालित अपने कार्यालय में ले आया था। पुलिस ने कुछ जेवर व बाइक जब्त किए थे, इस सिलसिले में सभी संदेहियों से पूछताछ की जा रही थी। बताया जा रहा है कि शब्बीर जोगी को गिरोह का मास्टर माइंड बताते हुए सीआइटी प्रभारी समेत सात पुलिसकर्मियों ने कई दिन तक उसे भूखे प्यासे हिरासत में रख कन्वेयर बेल्ट के पट्टे से पीटा। इसकी वजह से 24 दिसंबर की रात उसकी मौत हो गई। इस घटना की जानकारी होने पर पुलिसकर्मियों के हाथ-पांव फू ल गए और तड़के शव को जिला अस्पताल भेज दिया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना की जांच के लिए तात्कालीन पुलिस अधीक्षक डी श्रवण ने न्यायिक जांच के लिए पत्र लिखा। प्राथमिक तौर पर तात्कालीन न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी रमेश कुमार चौहान की उपस्थिति में शव का पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद इस मामले की जांच मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एवं अपर सत्र न्यायाधीश ने की। बताया जा रहा है कि जांच में सीआइटी प्रभारी कृष्णा कुमार ध्रुव, प्रधान आरक्षक रामकुमार पांडेय, आरके सिंह राजपूत, चंद्रमा राठौर, आरक्षक गुनाराम सिन्हा, चंद्रशेखर पांडेय, प्रशांत सिंह व गोपाल यादव को दोषी पाया गया है। जांच में कहा गया है कि पुलिसकर्मियों ने यह जानते हुए भी वह कार्य किया, जिससे किसी व्यक्ति की जान जा सकती थी। यानी पुलिसकर्मियों द्वारा प्रताडि़त किए जाने की वजह से ही शब्बीर की मौत होने की पुष्टि हुई है। जांच रिपोर्ट के आधार पर सभी सातों पुलिसकर्मियों के खिलाफ  मामला दर्ज किए जाने के निर्देश न्यायालय ने काफी पहले दे दिया था, पर बुधवार को सिटी कोतवाली में दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ  अपराध पंजीबद्ध किया गया। 
इस मामले में एफआइआर के साथ ही एक बार सभी दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ  विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए पर अभी भी सभी पुलिसकर्मी अपने पद पर बने हुए हैं। धारा 304 गैर जमानतीय मामला है और इसमें 10 साल की सजा का प्रावधान है। आमतौर पर इस तरह के मामले में पुलिस तत्काल आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है। चूंकि यह मामला पुलिस से जुड़ा हुआ है, इसलिए पुलिसकर्मियों को तीन दिन बाद भी गिरफ्तार नहीं किया गया है। इस पूरे मामले का गंभीर पहलू यह है कि सीआइटी का प्रभार सम्हाल रहे कृष्णा कुमार ध्रुव के खिलाफ  न्यायिक जांच चल रही थी, लेकिन इस बीच पुलिस विभाग ने उसे पदोन्नत कर सहायक उप निरीक्षक से उप निरीक्षक बना दिया। वर्तमान में कृष्णा मुंगेली जिला के लोरमी थाना में पदस्थ है। पुलिस विभाग के अफ सरों का कहना है कि विभागीय जांच लंबित नहीं था, इसलिए नियमानुसार पदोन्नत दिया गया है। वहीं विधिक जानकारों का दावा है कि गंभीर आरोपों में घिरे पुलिसकर्मियों को पदोन्नत नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जांच रिपोर्ट में कहा है कि मामला दर्ज करने के बाद पुलिस खुद धारा 304 मामले की जांच न करें। न्यायालय ने जांच की जवाबदारी स्वतंत्र एजेंसी से कराने कहा है। ऐसे में दोषी पुलिसकर्मियों से संबंधित थानों को छोडकर अलग क्षेत्र की पुलिस जांच करेगी। पुलिस के खिलाफ  ही मामला है। इसलिए न्यायालय ने यह अनुशंसा की है। सीआइटी की यह टीम प्रारंभ से ही विवादों में घिरी रही। हिरासत में मौत की इस घटना के बाद सीआइटी को भंग कर इसी तरह का क्राइम ब्रांच टीम गठित कर दिया गया था। आश्चर्य की बात तो यह है कि वही दोषी पुलिसकर्मियों से काम लिया जाता रहा। राज्य में कांग्रेस की सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के सभी क्राइम ब्रांच को तत्काल प्रभाव से भंग कराया। इसके बाद से इस तरह की कोई भी टीम अब काम नहीं कर रही

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