विवाद का दौरा


यूरोपीय संसद के अनौपचारिक प्रतिनिधिमंडल के जम्मू-कश्मीर दौरे से केंद्र सरकार को यह उम्मीद है कि घाटी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति साफ होगी और कुछ देशों द्वारा चलाया जा रहा दुष्प्रचार अपनी मौत मर जाएगा। लेकिन अभी तो देश में ही इस पर काफी विवाद हो गया है। एक तरफ विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए हैं, दूसरी तरफ कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर भी इससे भारत को कोई खास फायदा नहीं होगा। अपोजिशन का कहना है कि जब भारतीय सांसदों को घाटी में घुसने की इजाजत नहीं दी जा रही है, तो विदेशी सांसदों को वहां भेजने का क्या तुक है?
अगर सरकार मानती है कि वहां हालात सुधर गए हैं तो सबसे पहले देश की संसद के प्रतिनिधियों को हालात का जायजा लेने देना चाहिए था। जम्मू-कश्मीर के वर्तमान हालात को लेकर उनकी राय देश की जनता को आश्वस्त करती और दुनिया में भी इसका सकारात्मक संदेश जाता। एक परिपक्व लोकतंत्र में अपने जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा कर विदेशी प्रतिनिधियों को तवज्जो देना भारत की संप्रभुता को संदिग्ध बनाता है। अपोजिशन के साथ-साथ देश के कई अन्य राजनेताओं-विश्लेषकों ने इसके दूसरे पहलू की ओर ध्यान खींचा है। उन्होंने इस प्रतिनिधिमंडल के स्वरूप पर सवाल उठाया है।
यह यूरोपीय संघ का आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं है। इसमें शामिल ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड के एमपी अपनी निजी हैसियत से आए हैं और इनमें से ज्यादातर काफी विवादास्पद रहे हैं। उनकी छवि न अपने मुल्क में अच्छी है, न ही यूरोपीय संसद में। इन लोगों ने अगर जम्मू-कश्मीर को लेकर कुछ अच्छी बातें कहीं तो भी दुनिया इन पर भरोसा नहीं करेगी। खुद बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इन सांसदों को कश्मीर भेजने पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘मुझे आश्चर्य है, विदेश मंत्रालय ने यूरोपीय संघ से जुड़े नेताओं के जम्मू-कश्मीर में दौरे की व्यवस्था उनकी निजी हैसियत में की है। यह हमारी राष्ट्रीय नीति के खिलाफ है।Ó बहरहाल, इन्हें आमंत्रित करने के पीछे सरकार की मंशा बिल्कुल ठीक हो तब भी इस कवायद से कश्मीर पर बना भ्रम शायद ही साफ हो पाएगा।
यह सही है कि पाकिस्तान, मलयेशिया और तुर्की जैसे देश इस मामले में हमें घेर रहे हैं पर उन्हें जवाब तभी दिया जा सकेगा जब घाटी को लेकर हमारा रवैया कुछ छुपाने जैसा न नजर आए। जब हम विदेशियों को वहां जाने दे रहे हैं तो अपने लोगों को भला रोक क्यों रहे हैं? बेहतर होगा कि भारतीय सांसदों और राजनेताओं को बेरोकटोक घाटी जाने और वहां अपनी मर्जी से हर किसी से मिलने का अवसर मिले। वहां सामान्य स्थिति जल्द से जल्द बहाल की जाए ताकि वहां के लोगों का भरोसा लौटे। 370 हटाने का फैसला अगर विकास के लिए किया गया है तो विकास होता हुआ दिखे। एक बार सब कुछ सामान्य हो गया तो विदेशी दुष्प्रचार की हवा अपने आप निकल जाएगी और हमें सफाई देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

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